saksham

वो है हसीं शख्स ख़ुद, मांगेगा न मुझसे,ऐ सब, सोचता हूँ मैं तब, उसे कैसे नवाज़ देता.. जो आसमान सा बृहत, जो सूरज सा उज्जवल, उसे मैं क्या सवाब देता.. जिसने रखे सजो कर, ग़म भी जैसे मोती, उस इंसानियत के बुत को, मैं क्या लिहाफ देता.. सब सोच कर फिर सोचा, दूंगा नहीं मैं उसको, कुछ मांगता हूँ उससे, क्या वो हसीन मुझ को, एक वादा शुमार देगा, हँसता रहेगा हर दम, ये बात मान लेगा.

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

हिंदी में मस्ती: अब तो फांसी देदो जनाब

हिंदी में मस्ती: अब तो फांसी देदो जनाब
प्रस्तुतकर्ता SAKSHAM KUMAR SKS पर 4:23 am
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